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लहूलुहान होते शब्द

तर्क-वितर्क, आरोप-प्रत्यारोप, बहस और तकरार हमेशा से भारतीय राजनीति का अटूट हिस्सा रहे हैं। इसके बिना राजनीति की कल्पना भी शायद नहीं की जा सकती। लेकिन, एक अजीब सी परंपरा का चलन बढ़ रहा है। अपने प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ बेहद अशालीन और अपमानजनक भाषा का उपयोग करना एक सामान्य बात बनती जा रही है। आए दिन किसी न किसी नेता के मुंह से ऐसे शब्द निकलते हैं, जिनके लिए अक्सर बाद में उन्हें सफाइयां देनी पड़ती हैं। कई बार माफी भी मांगनी पड़ती है। लेकिन, यह अब एक स्थाई परंपरा बन चुकी है और इसकी पुनरावृत्ति लगातार हो रही है।

एक समय था, जब राजनेता एक-दूसरे पर बेहद गहराई तक मार करने वाले तंज भी कसते थे और तथ्यों पर आधारित आरोप भी जड़ते थे लेकिन यह सब भाषाई संयम और मर्यादित तरीके से होता था। वास्तव में कई बार इतने गहरे अंदाज में बातें कही जाती थीं कि आम लोगों को उसे समझने में थोड़ी अतिरिक्त समझदारी का प्रदर्शन करना पड़ता था। अब ऐसा नहीं है। दुर्भाग्य से अब ऐसी जहरबुझी शब्दावली का उपयोग हो रहा है जिसमें व्यंग्य से अधिक अपमान करने और घृणा का प्रदर्शन करने की भावना अधिक नजर आती है।

कर्नाटक के राजनेताओं की भाषाशैली भी हमेशा से लच्छेदार और बेहद गूढ़ता वाली रही है। खासतौर से नेता प्रतिपक्ष सिद्धरामय्या के शब्दबाण बेहद नुकीले रहते हैं और वे आज भी इसका बखूबी इस्तेमाल करते हैं। इधर पिछले कुछ समय से कन्नड़भाषी नेताओं की भाषा में भी वही जहरीलापन और घृणा की झलक नजर आने लगी है, जो पहले नहीं थी।

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नलिन कटील की टिप्पणियां और कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से प्रधानमंत्री के खिलाफ अशोभनीय शब्दों का इस्तेमाल इसकी ताजा बानगी है। जो कहा गया, वह सभी जानते हैं, इसलिए दोहराने का कोई औचित्य नहीं है। लेकिन, यह बात सोचने पर मजबूर करती है कि इस कटुता और भाषाई वैमनस्य की वास्तविक वजह क्या है?

लोकाचार और सार्वजनिक व्यवहार को समझने वालों का कहना है कि यह एक चारित्रिक गिरावट और मृलप्रवृत्तियों में स्थाई बदलाव का प्रतीक हो सकता है। इसके पीछे बहुत हद तक सोशल मीडिया से उत्पन्न विकार भी हैं। जानकारों का कहना है कि यह बात कई तरह से साबित हो चुकी है कि सोशल मीडिया ने हमारे वास्तविक जीवन को प्रभावित किया है।

आभासी दुनिया की तकनीकी निपुणताएं वास्तविक दुनिया में हमारी क्षमताओं को पुनर्परिभाषित कर रही हैं। सबसे बड़ी वजह यह है कि जब हम सोशल मीडिया पर अपने विचारों को प्रकट कर रहे होते हैं तो हमारे ऊपर वे दबाव नहीं होते जो रीयल टाइम में आपसी संवाद के दौरान होते हैं। एक व्यक्ति सोशल मीडिया पर किसी हस्ती के बारे में कुछ भी टिप्पणी करने का साहस दिखा देता है। लेकिन यह भी सच है कि यदि वही हस्ती सचमुच उसके सामने हो तो इस बात की पूरी संभावना है कि वह उन्हीं शब्दों का उपयोग शायद नहीं कर सकेगा।

प्रतिक्रिया का भय, उसका सामना कर पाने या नहीं कर पाने का डर होता है। इसलिए आमने-सामने की बातचीत होते समय लोग बहुत संभलकर सोच-समझ कर शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। सोशल मीडिया की पहुंच और ऑडियंस भले ही अनंत है लेकिन यह सब आभासी भी है। यही वर्चुअल रियलिटी हमें वह दुस्साहस देती है जो बाद में अक्सर अपमान और क्षोभ का कारण बन जाता है।

पुरानी कहावत है कि कमान से छूटा तीर और जुबान से निकले शब्द वापस नहीं लौटते। सोशल मीडिया एक ऐसा ब्लैक होल है, जिसमें सब कुछ समाता जा रहा है लेकिन वह कहीं किसी आर्काइव में दर्ज है, वक्त की सिलवटें हटने पर ये दबे हुए, कुरूप सच हमारे सामने आते रहते हैं, इसलिए बेहद सतर्कता से शब्दों का चयन करने की जरूरत है। राजनीति के रास्ते बेहद उलझे हुए हैं और एक-दूसरे को काटते रहते हैं। कोई नहीं जानता कब किसका रास्ता बदल कर विरोधी खेमे की ओर हो जाए, तो बाअदब, बामुलाहिजा, होशियार रहने की जरूरत है।

बशीर बद्र की इन पंक्तियों को समझें

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों

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