झूठे प्रतिमानों का टूटना…

महामारी की मार से कराहते देश में लोक का कोई मोल नहीं बचा है। लोग दवाओं के बिना, अस्‍पतालों के बाहर, फुटपाथ पर सड़क किनारे या गलियों में दम तोड़ रहे हैं। बंद घरों के अंदर लाशें सड़ने की खबरें आ रही हैं। ऑक्‍सीजन के बिना लोगों का चंद पलों में दम घुट जाता है और पीछे रह जाता है एक जिंदगी भर का रोना…

लोक कल्याणकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सर्वोपरि लोक है। लेकिन कुछ लोग शायद ऐसा नहीं सोचते। अब तक सरकार के पास इस आपदा से निपटने की कोई रणनीति नहीं दिख रही है। नुकसान का दायरा बढ़ता जा रहा है। अदालतें चीख चीख कर कुव्यवस्थाओं के लिए सरकार को फटकार रही हैं लेकिन कोई बदलाव आता नहीं दिख रहा।

सत्रह साल बाद देश के सामने ऐसे हालात बन चुके हैं कि उसे विदेशों से मदद के लिए हाथ पसारना पड़ गया और बंगलादेश जैसे देशों से तक मदद स्‍वीकार कर ली गई लेकिन विडंबना यह है कि विदेशों से आ रही यह मदद भी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रही है। खबरें आ रही हैं कि बड़ी तादाद में आए उपकरण और सामग्री हवाई अडडों पर ही पड़े हैं। सरकारी तंत्र इन्‍हें नियेाजित तरीके से राज्‍यों में वहां तक नहीं पहुंचा रहा, जहां हाहाकार मचा हुआ है।

हालात देख कर ऐसा लगता है कि देश में कोई व्‍यवस्‍था नाम की चीज ही नहीं है। राजनीतिक और पता नहीं क्‍या क्‍या एंगल हैं, जिनसे सब कुछ तय हो रहा है। किसकी सरकार हे, कहां चुनाव होंगे कहां कौन सा वर्ग है… उसी हिसाब से सब तय किया जा रहा है

बहुमतवाद का ऐसा घमंड शायद इतिहास में कभी नहीं देखा गया होगा। लोगों की जिंदगी दांव पर लग गई, काम धंधे बंद हो गए क्‍योंकि सरकार ने आपदा से निपटने की कोई तैयारी नहीं की। जिस युद्ध स्तर पर अब कोशिश शुरू की गई है यदि यही सब पिछले 8-10 महीने में किया गया होता तो हालात इतने खराब नहीं होते।

बहुत से लोगों की जान बचाई जा सकती थी। बहुत से झूठे प्रतिमान शायद बने रहते, सब कुछ अपनी गति से चलता रहता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। झूठे प्रतिमान टूट गए और सच सामने आ गया। अब डर यही है कि नए झूठ को प्रतिमान बनाया जाएगा और वह शायद ज्‍यादा घातक होगा।

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