कर्नाटक की राजनीति और परिवारवाद की परंपरा

इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि कर्नाटक की राजनीति परिवारवाद और व्यक्तिनिष्ठा पर टिकी है। कांग्रेस, भाजपा और जनता दल-एस सभी परिवारवाद को खुलकर प्रश्रय देते हैं और लोकसभा चुनाव 2024 में भी यही हो रहा है। लेकिन, इस बार भाजपा व कांग्रेस को इस परिवारवादी रवैये के कारण अंदरूनी असंतोष का कुछ ज्यादा ही सामना करना पड़ रहा है। शिवमोग्गा और कोलार इन दोनों पार्टियों को टीस देने वाले सबसे बड़े जख्म साबित हो रहे हैं।

भाजपा : परिवारवाद और व्यक्तिनिष्ठा का तड़का

पूरे देश में कांग्रेस को एक परिवार के प्रति समर्पित पार्टी बताकर हमले करने वाली भाजपा, कर्नाटक में खुल कर अपनी राजनीति में परिवारवाद और व्याक्तिनिष्ठा का तड़का लगा रही है। पार्टी के सबसे पुराने और अहम नेताओं में से एक केएस ईश्वरप्पा ने इसका विरोध करते हुए बगावत का झंडा उठा लिया है। यह बात दीगर है कि उनका आक्रोश भी अपने पुत्र को टिकट नहीं दिलवा पाने से भड़का है। प्रदेश में भाजपा को येडियूरप्पा परिवार की बपौती नहीं बनने देने का दंभ भरते हुए ईश्वरप्पा ने पूर्व सीएम बीएस येडियूरप्पा के बेटे बीवाई राघवेंद्र के खिलाफ ही निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर रखा है। येडियूरप्पा के दूसरे बेटे बीवाई विजयेंद्र विधायक होने के साथ ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं और यही बात ईश्वरप्पा के आक्रोश की सबसे बड़ी वजह है। उनका तर्क साफ है कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें चुनावी राजनीति से दूर कर दिया लेकिन उनके बेटे को टिकट क्यों नहीं दिया गया?

जनता दल-एस : परि‍वारवाद के झंडाबरदार

दस साल पहले नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर देश छोड़ देने की घोषणा करने वाले पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा भी पुत्र मोह के कारण इस बार भाजपा से हाथ मिलाकर परिवारवाद को ही आगे बढ़ा रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में जद-एस की दुर्दशा (19 सीट) के बाद पार्टी को बचाने का यही रास्ता‍ उन्हें दिखा और तमाम सिद्धांतों की बली चढ़ाते हुए उन्होंने भाजपा से गठबंधन कर लिया। गठबंधन के बाद राज्य में महज तीन सीटें उनके खाते में आई हैं, एक पर बेटे एचडी कुमारस्वामी और दूसरे पर पौत्र प्राज्वल रेवण्णा को उतार कर उन्होंने साबित कर दिया कि परि‍वारवादी राजनीति के सच्चे झंडाबरदार वही हैं। यही नहीं, देवगौड़ा के दामाद डॉ. मंजूनाथ को भाजपा ने बेंगलूरु ग्रामीण सीट से चुनाव मैदान में उतारा है। यह राजनीति में परिवारवाद की पराकाष्ठा है।

कांग्रेस : परिवारों तक ही सीमित

कांग्रेस अध्यक्ष एम. मल्लि‍कार्जुन खरगे ने भी अपने दामाद को गुलबर्गा से टिकट देकर भाजपा को बता दिया कि हम भी कम नहीं हैं। कांग्रेस ने कम से कम 8 मंत्रियों और पूर्व मंत्री के बेटे-बेटियों को मैदान में उतार दिया है और एक और मंत्री के दामाद को कोलार से उतारने की योजना थी लेकिन इसका भारी विरोध हुआ। गांधी परिवार की अंधभक्ति का आरोप झेलने वाली कांग्रेस ने साबित कर दिया है कि इस लोकसभा चुनाव में टिकट वितरण का पैमाना भी केवल परिवारवाद तक ही सीमि‍त है। इस पर सिद्धरामय्या कहते हैं, हां, हमने दिया है। हमने उन लोगों को टिकट दिया, जिनकी निर्वाचन क्षेत्र के लोगों ने सिफारिश की थी। यह वंशवाद की राजनीति नहीं है, बल्कि लोगों की राय को स्वीकार करना है।

मतदाताओं को नहीं होता ऐतराज

कर्नाटक के लोग आमतौर पर अपने उम्मीदवारों का चयन जाति, समुदाय और परिवार को देखकर ही करते हैं इसलिए राजनीतिक दल जनता की इस प्रवृत्ति का फायदा उठा रहे हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव में भी यही प्रवृत्ति बरकरार रहने की संभावना नजर आती है। रोचक केवल यह देखना होगा कि इसका सबसे ज्यादा फायदा किसे मिलता है।