सच्‍चाई को नकारने का खेल

मौत से बड़ा दूसरा कोई सच नहीं। इंसान की मौतों को झूठ का खेल मत बनाइए। अगर सरकार अपने ही नागरिकों की मौत को आंकड़ों का खेल बनाएंगी तो उसे इसका खामियाजा भुगतना होगा। महामारी से लोग जान गंवा रहे हैं। यह अगर महज एक आंकड़ा है तो ऐसा सोचना बेहद अमानवीय है।

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जिन्‍होंने जान गंवाई उनके परिजनों को अब हमेशा इस सच के साथ रहना होगा। उनके नुकसान की किसी भी रूप में क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती। तो सरकार को क्‍या लगता है कि रिकार्ड में कम आंकड़े दिखाकर वे अपनी विफलता को कम कर लेंगे? नहीं हो सकता.. यह दुर्भाग्‍यपूर्ण है और सच को दबाने का घिनौना प्रयास है।

समय का तकाजा है कि सरकार अपनी कमियों को दुरुस्‍त करने के लिए कमर कस कर जुट जाए। सोलह साल में पहली बार किसी आपदा में देश ने विदेशी मदद स्‍वीकार की है। इसमें किसी का कुछ नहीं घटा। अगर कुछ जाने बचाने में मदद मिलती है तो इससे अच्‍छा और क्‍या होगा।

यह समय थोथे अहम को पाले रखने और किसी बेजा जिद के लिए निर्दोषों की बलि चढ़ाने का नहीं है। महामारी से निपटने के लिए मिल कर लड़ने का समय है। झूठे आंकड़ बनाने में शक्ति और ऊर्जा मत गंवाइए.. सच के साथ बने रहिए क्‍योंकि अंत में उसी की जीत होगी।

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