BJP की दक्षिण के जरिये अब की बार 400 पार की राह इतनी भी आसान नहीं

यह तो सभी जानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस बार लोकसभा चुनाव (Loksabha Election 2024) में 400 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्‍य रखा है। वे जनता से नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के तीसरे कार्यकाल के लिए वोट मांग रहे हैं। हालांकि यह लक्ष्‍य कितना यथार्थनिष्‍ठ है और क्‍या सचमुच एनडीए (NDA) इस बार 400 पार जा सकता है यह अभी रहस्‍य के गर्भ में है। माना जा रहा है कि भाजपा ने इस अति महत्‍वाकांक्षी लक्ष्‍य को पाने के लिए दक्षिण भारत पर अपना फोकस बढ़ा दिया है और वे उम्‍मीद कर रहे हैं कि कर्नाटक (Karnataka) की तरह अन्‍य दक्षिण भारतीय (South India) राज्‍यों में भी अच्‍छा प्रदर्शन कर अपने दुरूह से दिख रहे लक्ष्‍य को पूरा कर सकेंगे।

गठबंधन से मिलेगा फायदा या बनेगी गले की फांस

इस बात पर भी बहस की जा सकती है कि क्‍या भाजपा को इस बार कर्नाटक में पिछले चुनावों की तरह एकतरफा जीत मिलने वाली है? तो इसका जवाब होगा नहीं। कर्नाटक में पिछली बार भाजपा ने 28 में से 25 सीटें जीती थीं इसलिए इस बार उसकी सीटों में कमी आना लाजिमी है। पिछले चुनाव में समीकरण अलग थे और इस बार बिल्‍कुल अलग हें। पिछली बार जहां कांग्रेस और जनता दल-एस का गठबंधन सत्ता में था, उन्‍होंने मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा था और बुरी तरह मात खाई थी। अब राज्‍य में कर्नाटक की बहुमत वाली सरकार है और भाजपा ने अपने प्रतिद्वंद्वी जनता दल-एस से गठबंधन कर रखा है।

भाजपा के सामने अंतर्कलह और बगावत की चुनौती

इस सबसे अलग सबसे महत्‍वपूर्ण तथ्‍य यह है कि भाजपा में इस वक्‍त जबर्दस्‍त अंतर्कलह मची हुई है और उसे कई अहम सीटों पर बगावत का सामना भी करना पड़ रहा है। उसे कई प्रत्‍याशियों के खिलाफ भाजपा कार्यकर्ताओं में ही नाराजगी दिख रही है और कई जगहों पर सहयोगी जद-एस के कार्यकर्ता उसके साथ नजर नहीं आ रहे। यह सब पिछले चुनाव में भी हुआ था। तब भाजपा की जगह कांग्रेस थी इसका खामियाजा उसने करारी हार के रूप में झेला था। कुछ जगहों पर जद-एस को भी आंतरिक कलह और कार्यकर्ताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। मसलन, हासन में अगर भाजपा के वोट जद-एस को नहीं मिले तो बाजी कांग्रेस के हाथ लग सकती है। मंड्या में निवर्तमान निर्दलीय सांसद सुमलता को धकिया कर गठबंधन के एडजस्‍टमेंट से टिकट हड़पने वाले एचडी कुमारस्‍वामी की जीत आसान नहीं दिख रही है। अंबरीश के प्रशंसक और समर्थकों का रुख कुमारस्‍वामी के भविष्‍य को तय करने में एक अहम फैक्‍टर साबित हो सकता है। शिवमोग्‍गा में केएस ईश्‍वरप्‍पा ने और धारवाड़ में दिंगलेश्‍वर स्‍वामी ने बगावत का झंडा उठा कर भाजपा की राह कठिन कर दी है।

दक्षिण की सोच और व्‍यक्तिनिष्ठ प्रवृत्ति‍यां बेहद अहम

उत्तर कर्नाटक में भाजपा को पिछली बार बड़ी बढ़त मिली थी लेकिन इस बार उसे वहां कई अहम सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है। पार्टी ने वहां अपना जनाधार गंवाया है और कुछ हद तक उसे इसका खामियाजा सीटें गंवा कर ही चुकाना होगा। कई वरिष्‍ठ नेताओं को जिस तरह दरकिनार किया गया, वह जनता के गले से नहीं उतरा है। दक्षिण भारत का मानस अलग ढंग से व्‍यवहार करता है और व्‍यक्तिनिष्ठ प्रवृत्ति‍यों के चलते अपने नेताओं के साथ किए गए व्‍यवहार को आसानी से भूलता नहीं है। जाति, समुदाय और मठों की भूमिकाएं भी कर्नाटक में अपना पूरा रोल निभाती हैं सो है ही।

अगले अंक में और गहराई से इस पर चर्चा जारी रहेगी…..